नागपूजा या नागपंचमी
नाग पूजा: -
नाग पंचमी या नाग पूजा को सावन के पहले सोमवार को मनाया जाता है, जिसमें नाग देवता की पूजा की जाती है,
मोटे तौर पर देखा जाए तो सोमवार का महत्व भी इसी कारण से हैं ..
सावन के महीने में नाग पंचमी आने के कारण सावन का महत्व भी बढ़ जाता है, इसने लोगों के द्वारा विधि विधान के द्वारा नाग देवता की पूजा की जाती है इसे नाग पंचमी के नाम से या नाग पूजा के नाम से जाना जाता है।
धार्मिकता के अनुसार माना गया है तो किसी की कुंडली में कालसर्प का योग हो तो इस पूजा को करने से कालसर्प का योग समाप्त हो जाता है और धन-धान्य की वृद्धि होती हैं ऐसे प्राचीन समय से मान्यता मानी जाती है ।।
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नाग पंचमी के दिन दीवार को गैरों से पोचा जाता है और जहां पर गेरू लगाया जाता है वहां पर नाग का चित्र बनाया जाता है।
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- ऐसे रिवाज में नाग पंचमी के दिन दूध की सेवईयां बनाई जाती हैं।
-प्राचीन रिवाजों के अनुसार देखा जाए तो इस दिन सोने चांदी या लकड़ी की पेंसिल से दरवाजे पर पांच फन वाला नाग बना जाता है ।।
-मान्यता है कि कुंडली में कालसर्प का दोष होने के कारण जो भी विपदा होती हैं, वह इस पूजा से टल जाती हैं ऐसी प्राचीन धारणा बनी हुई है।
हिंदू पंचांग के मुताबिक सावन महीने की शुक्ल पंचमी को नागपंचमी के रूप में मनाया जाता है,
भारत के अंदर अलग-अलग जगह पर अलग-अलग तरह की मान्यताएं प्रचलित हैं कहानी पूजा और विभिन्न तरह के क्रियाकलाप इसमें किए जाते हैं ।।
उज्जैन में नागचंद्रेश्वर का मंदिर है जो नाग पंचमी के दिन ही खुलता है और वहां पूजा अर्चना की जाती है।
नाग पंचमी मनाने का एक मान्यता यह भी है कि अभिमन्यु के पुत्र राजा परीक्षित ने तपस्या में लीन मेनू ऋषि के गले में सर्प डाल दिया था।
इस पर ऋषि के शिष्य श्रृंगी ऋषि ने श्राप दिया कि 7 वे दिन तुम नाग नागसेगा
ठीक 7 दिन पश्चात राजा परीक्षित को सांप ने मारा यह प्राचीन धारणा बनी हुई है ।।
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प्राचीन मान्यताओं के अनुसार हम अपनी धारणा पर अडिग रहें, जो हमारे सभी धर्मों के साथ ग्रंथ प्रमाणित करते हैं क्या वह साधना हमें चाहिए ..
आज सर्व मानव समाज प्राचीन समय से चली आ रही परंपराओं पर अडिग हैं लेकिन वास्तव में हमारी सब ग्रंथ इन बातों को प्रमाणित करते हैं कि हमें यह करना चाहिए।
गीता जी और चारों वेद हमारे हिंदू धर्म सभी पवित्र धर्म और शास्त्र माने जाते हैं जो, यह शास्त्र प्रमाणित करते हैं वही भक्ति साधना हमें करने से हमारा जन्म और मृत्यु रूपी दीर्घ रोग सदा के लिए समाप्त हो जाता है।
श्रीमद भगवत गीता जी के अनुसार शास्त्र अनुकूल भक्ति साधना करने से ही हम सभी लाभ और मुक्ति प्राप्त होती हैं।
गीता जी अध्याय 4 श्लोक 32 में प्रमाण है गीता ज्ञान दाता भी किसी पूर्ण संत की शरण में जाने को कह रही है कि जिन की शरण ग्रहण करके तटस्थकपट भाव से प्रश्न करने से वह अध्यात्म के संपूर्ण जानकारी आपको उस तत्व ज्ञान को प्रदान करेगी।
जिस मार्ग पर चलने से 84 लाख योनियों का चक्र सदा के लिए समाप्त हो जाएगा, वह तत्वदर्शी आपको पूर्ण अध्यात्म मार्ग बताएगा।
श्रीमद्भागवत गीता जी के अनुसार वह पूर्ण संत आपको तीन बार में नाम लिखा देंगे, जिसका प्रमाण गीता जी में भी है ओम गीता ..
गीता अध्याय 15 श्लोक 1 में तत्वदर्शी संत की पहचान बताई उसमें बताया गया है यह संसार रूपी वृक्ष है जिसे को जड़ से लेकर पत्तों तक जो विस्तार से बताएगा, वही पूर्ण संत होगा।
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वर्तमान में पूर्ण संततिगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज हैं ।।
श्रीमद भगवत गीता अध्याय 18 श्लोक 62 में प्रमाण है हे अर्जुन आप उस भगवान की शरण में जा रहे हैं।
जिनकी कृपा से ही परम शांति और सनातन परमधाम को प्राप्त होगा अर्थात गीता ज्ञान दाता भी अपने से किसी अन्य भगवान की शरण में जाने को कह रही है।
जब तक हम शास्त्र अनुकूल भक्ति साधना नहीं करेंगे तब तक हमें किसी प्रकार का लाभ नहीं हो सकता है आज हम नाग पूजा की बात कर रहे हैं नाग पूजा की जाती है ।
जो कि गीता और चारों ओर वेदों में वर्णित नहीं है यह पुरानी मान्यताओं के आधार पर और पुराणों के आधार पर प्रचलित हैं जिससे हमारा मोक्ष नहीं हो सकता है।
आज सर्व मानव समाज शिक्षित है, हम अपने सभी पवित्र धर्म और ग्रंथों को अपनी आँखों से देख सकते हैं और पढ़कर प्रमाण को समझ सकते हैं
और उसी के आधार पर भक्ति साधना कर सकते हैं ।।
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